हमे अपने देश के इतिहास में मौजूद गौसेवा का सबक नहीं भूलना चाहिए| हमारे देश में गोसेवा करना जीने का एक बेहतर मकसद है और मरने का भी| गाय के लिए अवाम ने लड़ाई लड़ी है, और इमानदारी से आगे किसी सरकार का जोर नहीं, किसी बेईमानी, अजाब या अत्याचारी की भी नहीं चलती, आज उन लोगों को सबक सिखाने की जरुरत है| आज इस शहर की बुनियादी जरुरत तो यही है कि ये बात सबको बताई जाए कि गौसेवा करना गाय और सभी जानवरों के साथ नेकी करने का नाम दया है| और दया करने का साहस सबके अन्दर नैसर्गिक रूप से मौजूद होती है, हम थोडा-थोडा धीरे-धीरे अपने अन्दर उस जानवर को बैठाते जा रहे हैं जो हमारी दया को खा जाता है और हमे संशयात्मा बनाता है, कायर बना देता है| जिसके चलते हमारे ही साथी लोग पहले कायर होकर अर्जुन जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ होते हैं और शोर्ट कट से सफलता के चक्कर में दलाली उठाईगिरी और लैमारी करते करते अपराधी होते जाते हैं| जवानी की गलतियों का पता चलता है अधेड़ होते-होते| तब उनकी क्षमताएं भी कमतर होती जाती हैं, हिम्मत हौसला भी जवाब दे जाता है| तब अगर उन्हें जमीनी हकीकत का ख्याल भी हो तो भी सही और आसान के बीच चुनना मुश्किल लगता है| ऐसे में आम लोग भी अपराध बोध से ग्रस्त होकर अपराधी तक बन जाते हैं| इसलिए भगवान जी से यही प्रार्थना है कि वह इस गौसेवा को झूठ और फरेब से बचाए| आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, कतई निराश मत होइए| भैयाजी नेकी करो और दरिया में डालो, इतने भर से पूरा मछली बाजार चल जाता है| वो मछली मारना भले ही बंद कर दे, सारी मछलियाँ गन्दगी से भले मर जाएँ लेकिन हम दरिया में गन्दगी डालना तो नहीं बंद करने वाले| इस शहर की तासीर ही ऐसी हो चली है| क्या करें समाज का डिजाईन ही ऐसा हो गया है कि आदमी को जानवर की क्या आदमी को आदमी की फिक्र नहीं हो रही| क्या किया जाए शहर के पानी में गन्दगी घुल रही है और शहर में गंगा भी दम तोड़ती लगती है| गाय के नंबर कम करने वाले लोग बताएं कि गंगा तो देश के हर कुएं, तालाब और नदी की प्रतीक है, हर इन्सान की जिंदगी में सीधी जुडी है, ऐसा लगता है कि किसी को नजर नहीं आती! उसमे भी लोग प्रोजेक्ट और ठेकेदारी के चक्कर में लगे हैं| ऐसा लगता है कि लोगों में न तो शिद्दत बची है और न ही हमदर्दी| कहते हैं जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन| अब गंगा के प्रदूषण का असर किसी के दिमाग पर हो ये और बात है, लेकिन इतना कुछ जानकर कोई नेकी करना तो नहीं बंद कर देता| अपना अपना किया अपने-अपने हाथ है. इस दुनिया में जन्म के सूरमा या नेता तो मिलने मुश्किल हैं| आप लोगों के कर्मयोग ने एक उम्मीद तो जगाई है| मेरी नजर में तो आप लोगों को उन लालची और मक्कार लोगों से सिर्फ गाय और गंगा ही नहीं, पूरे शहर, समाज और देश को बचाने की जरुरत है| उस भावना को बचाने की जरूरत है जिसमे आपकी चाहत आपकी शिद्दत और समर्पण बनती है, जिससे आप रोज-ब-रोज गौसेवा का आनंद ले पा रहे हैं, बाकी विधर्मियों को तो ये मयस्सर भी नहीं| आप लोगों के समर्पण को लोगों के बीच पहुंचा कर, आगे बढाकर ही वह भावना बनाई और बचाई जा सकती है, जिसमे गाय, गाँव और गंगा का सम्मान हो सके| एक बेहतर देश बेहतर समाज के सपने के साथ आपके समर्पण को नमन करता हूँ| आपकी निष्ठां समाज की संपत्ति है| इस आन्दोलन में हम जैसे कहीं काम आ सकें इसी कामना के साथ मेरी शुभकामनाएं|Featured Post
.... तो मत भूलो ये कि ये देश गायों का है!
हमे अपने देश के इतिहास में मौजूद गौसेवा का सबक नहीं भूलना चाहिए| हमारे देश में गोसेवा करना जीने का एक बेहतर मकसद है और मरने का भी| गाय के...
Wednesday, November 15, 2017
.... तो मत भूलो ये कि ये देश गायों का है!
हमे अपने देश के इतिहास में मौजूद गौसेवा का सबक नहीं भूलना चाहिए| हमारे देश में गोसेवा करना जीने का एक बेहतर मकसद है और मरने का भी| गाय के लिए अवाम ने लड़ाई लड़ी है, और इमानदारी से आगे किसी सरकार का जोर नहीं, किसी बेईमानी, अजाब या अत्याचारी की भी नहीं चलती, आज उन लोगों को सबक सिखाने की जरुरत है| आज इस शहर की बुनियादी जरुरत तो यही है कि ये बात सबको बताई जाए कि गौसेवा करना गाय और सभी जानवरों के साथ नेकी करने का नाम दया है| और दया करने का साहस सबके अन्दर नैसर्गिक रूप से मौजूद होती है, हम थोडा-थोडा धीरे-धीरे अपने अन्दर उस जानवर को बैठाते जा रहे हैं जो हमारी दया को खा जाता है और हमे संशयात्मा बनाता है, कायर बना देता है| जिसके चलते हमारे ही साथी लोग पहले कायर होकर अर्जुन जैसे किंकर्तव्यविमूढ़ होते हैं और शोर्ट कट से सफलता के चक्कर में दलाली उठाईगिरी और लैमारी करते करते अपराधी होते जाते हैं| जवानी की गलतियों का पता चलता है अधेड़ होते-होते| तब उनकी क्षमताएं भी कमतर होती जाती हैं, हिम्मत हौसला भी जवाब दे जाता है| तब अगर उन्हें जमीनी हकीकत का ख्याल भी हो तो भी सही और आसान के बीच चुनना मुश्किल लगता है| ऐसे में आम लोग भी अपराध बोध से ग्रस्त होकर अपराधी तक बन जाते हैं| इसलिए भगवान जी से यही प्रार्थना है कि वह इस गौसेवा को झूठ और फरेब से बचाए| आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं, कतई निराश मत होइए| भैयाजी नेकी करो और दरिया में डालो, इतने भर से पूरा मछली बाजार चल जाता है| वो मछली मारना भले ही बंद कर दे, सारी मछलियाँ गन्दगी से भले मर जाएँ लेकिन हम दरिया में गन्दगी डालना तो नहीं बंद करने वाले| इस शहर की तासीर ही ऐसी हो चली है| क्या करें समाज का डिजाईन ही ऐसा हो गया है कि आदमी को जानवर की क्या आदमी को आदमी की फिक्र नहीं हो रही| क्या किया जाए शहर के पानी में गन्दगी घुल रही है और शहर में गंगा भी दम तोड़ती लगती है| गाय के नंबर कम करने वाले लोग बताएं कि गंगा तो देश के हर कुएं, तालाब और नदी की प्रतीक है, हर इन्सान की जिंदगी में सीधी जुडी है, ऐसा लगता है कि किसी को नजर नहीं आती! उसमे भी लोग प्रोजेक्ट और ठेकेदारी के चक्कर में लगे हैं| ऐसा लगता है कि लोगों में न तो शिद्दत बची है और न ही हमदर्दी| कहते हैं जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन| अब गंगा के प्रदूषण का असर किसी के दिमाग पर हो ये और बात है, लेकिन इतना कुछ जानकर कोई नेकी करना तो नहीं बंद कर देता| अपना अपना किया अपने-अपने हाथ है. इस दुनिया में जन्म के सूरमा या नेता तो मिलने मुश्किल हैं| आप लोगों के कर्मयोग ने एक उम्मीद तो जगाई है| मेरी नजर में तो आप लोगों को उन लालची और मक्कार लोगों से सिर्फ गाय और गंगा ही नहीं, पूरे शहर, समाज और देश को बचाने की जरुरत है| उस भावना को बचाने की जरूरत है जिसमे आपकी चाहत आपकी शिद्दत और समर्पण बनती है, जिससे आप रोज-ब-रोज गौसेवा का आनंद ले पा रहे हैं, बाकी विधर्मियों को तो ये मयस्सर भी नहीं| आप लोगों के समर्पण को लोगों के बीच पहुंचा कर, आगे बढाकर ही वह भावना बनाई और बचाई जा सकती है, जिसमे गाय, गाँव और गंगा का सम्मान हो सके| एक बेहतर देश बेहतर समाज के सपने के साथ आपके समर्पण को नमन करता हूँ| आपकी निष्ठां समाज की संपत्ति है| इस आन्दोलन में हम जैसे कहीं काम आ सकें इसी कामना के साथ मेरी शुभकामनाएं|
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